Desh Bhakti Kavita In Hindi

Desh Bhakti Kavita : दोस्तों अगर आप 26 जनवरी या 15 के लिए कोई देश भक्ति कविता ढूंढ रहे हैं। तो हम आपको कुछ ऐसे देश भक्ति कविता देने वाले हैं। जो कि आप इन को याद करके अपने स्कूल या अपने कॉलेजों में बोल सकते हैं। हम 15 अगस्त और 26 जनवरी को देश भक्ति कविता इसलिए याद रखते हैं। ताकि हम अपने देश के लिए सम्मान की बात कर सकें। देशभक्ति कविता (Desh Bhakti Kavita in Hindi) हमारे देश के लिए और हमारे देश की सेवा करने वालों के बारे में बहुत सारे बताते है इस छोटी सी कहानियां में जिनको हम अपने स्कूल में या अपने कॉलेजों में उसे गाकर लोगों को याद दिलाते हैं

अगर आप देशभक्ति कविता (जोश भर देने वाली देशभक्ति कविता) ढूंढ रहे तो आप यहां पर देख सकते हैं। हमने आपको काफी सारे देश भक्ति कविता (Desh bhakti kavitayen in hindi) दिए हैं। जिनको आप याद कर सकते हैं और अपने स्कूल और कॉलेजों में उस कविता को गा सकते हैं तो चलिए देखते हैं कि कौन-कौन से देश भक्ति कविता है जिनको आप अपने स्कूल और कॉलेजों में गा सकते हैं। तो चलिए देखते हैं सबसे अच्छी देशभक्ति कविताDesh bhakti kavita in englishदेशभक्ति कविता छोटी सी, बच्चों देश भक्ति कविता, भारत देश पर कविता, दिनकर की देशभक्ति कविता कौन से है

Desh Bhakti kavita in Hindi

दोस्तों आज के इस लेख में हम आपको बताएँगे कुछ देशभक्ति से भरी कविताये ( Desh Bhakti Kavita in Hindi ) ।  ये कविताये पढ़ने के बाद आपके अंदर भी देश भक्ति का भाव जाग उठेगा।  आप इन कविताओं  को अपने दोस्तों व् जानने वाले को भी भेज सकते है।

तिरंगा

हमारी शान है ये तिरंगा
ये विश्व भर में भारती की ये अमिट पहचान है।
ये तिरंगा हाथ में ले पग निरंतर ही बढ़े
ये तिरंगा हाथ में ले दुश्मनों से हम लड़े
ये तिरंगा दिल की धड़कन ये हमारी जान है

ये तिरंगा विश्व जन को सत्य का संदेश है
ये तिरंगा कह रहा है अमर भारत देश है
ये तिरंगा इस धरा पर शांति का संधान है

ये तिरंगा विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र है
ये तिरंगा वीरता का गूँजता इक मंत्र है
ये तिरंगा वंदना है भारती का मान है

इसके रेषों में बुना बलिदानियों का नाम है
ये बनारस की सुबह है, ये अवध की शाम है
ये तिरंगा ही हमारे भाग्य का भगवान है

ये कभी मंदिर कभी ये गुरुओं का द्वारा लगे
चर्च का गुंबद कभी मस्जिद का मिनारा लगे
ये तिरंगा धर्म की हर राह का सम्मान है
ये तिरंगा स्वर्ग से सुंदर धरा कश्मीर है
ये तिरंगा झूमता कन्याकुमारी नीर है
ये तिरंगा माँ के होठों की मधुर मुस्कान है

ये तिरंगा बाईबल है भागवत का श्लोक है
ये तिरंगा आयत-ए-कुरआन का आलोक है
ये तिरंगा वेद की पावन ऋचा का ज्ञान है

ये तिरंगा देव नदियों का त्रिवेणी रूप है
ये तिरंगा सूर्य की पहली किरण की धूप है
ये तिरंगा भव्य हिमगिरि का अमर वरदान है

शीत की ठंडी हवा, ये ग्रीष्म का अंगार है
सावनी मौसम में मेघों का छलकता प्यार है
झंझावातों में लहरता ये गुणों की खान है

ये तिरंगा लता की इक कुहुकती आवाज़ है
ये रवि शंकर के हाथों में थिरकता साज़ है
टैगोर के जनगीत जन गण मन का ये गुणगान है

ये तिंरगा गांधी जी की शांति वाली खोज है
ये तिरंगा नेता जी के दिल से निकला ओज है
ये विवेकानंद जी का जगजयी अभियान है

रंग होली के हैं इसमें ईद जैसा प्यार है
चमक क्रिसमस की लिए यह दीप-सा त्यौहार है
ये तिरंगा कह रहा- ये संस्कृति महान है

ये तिरंगा अंदमानी काला पानी जेल है
ये तिरंगा शांति औ’ क्रांति का अनुपम मेल है
वीर सावरकर का ये इक साधना संगान है

ये तिरंगा शहीदों का जलियाँवाला बाग़ है
ये तिरंगा क्रांति वाली पुण्य पावन आग है
क्रांतिकारी चंद्रशेखर का ये स्वाभिमान है

रंग केसरिया बताता वीरता ही कर्म है
श्वेत रंग यह कह रहा है, शांति ही धर्म है
हरे रंग के स्नेह से ये मिट्टी ही धनवान है

ऋषि दयानंद के ये सत्य का प्रकाश है
महाकवि तुलसी के पूज्य राम का विश्वास है
ये तिरंगा वीर अर्जुन और ये हनुमान है

कवि—राजेश चेतन

मेरा देश बड़ा गर्वीला

मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतु-रंग-रंगीली
नीले नभ में बादल काले, हरियाली में सरसों पीली

यमुना-तीर, घाट गंगा के, तीर्थ-तीर्थ में बाट छाँव की 
सदियों से चल रहे अनूठे, ठाठ गाँव के, हाट गाँव की 
                                    
शहरों को गोदी में लेकर, चली गाँव की डगर नुकीली
मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतु-रंग-रंगीली

खडी-खड़ी फुलवारी फूले, हार पिरोए बैठ गुजरिया
बरसाए जलधार बदरिया, भीगे जग की हरी चदरिया

तृण पर शबनम, तरु पर जुगनू, नीड़ रचाए तीली-तीली
मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतु-रंग-रंगीली

घास-फूस की खड़ी झोपड़ी, लाज सम्भाले जीवन-भर की
कुटिया में मिट्टी के दीपक, मंदिर में प्रतिमा पत्थर की

जहाँ वास कँकड़ में हरि का, वहाँ नहीं चाँदी चमकीली 
मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतु-रंग-रंगीली 

जो कमला के चरण पखारे, होता है वह कमल-कीच में
तृण, तंदुल, ताम्बूल, ताम्र, तिल के दीपक बीच-बीच में

सीधी-सदी पूजा अपनी, भक्ति लजीली मूर्ति सजीली
मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतुरंग-रंगीली 

बरस-बरस पर आती होली, रंगों का त्यौहार अनोखा 
चुनरी इधर-उधर पिचकारी, गाल-भाल पर कुमकुम फूटा

लाल-लाल बन जाए काले, गोरी सूरत पीली-नीली
मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतुरंग-रंगीली

दिवाली -- दीपों का मेला, झिलमिल महल-कुटी-गलियारे
भारत-भर में उतने दीपक, जितने जलते नभ में तारे

सारी रात पटाखे छोडे, नटखट बालक उम्र हठीली
मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतुरंग-रंगीली

खंडहर में इतिहास सुरक्षित, नगर-नगर में नई रौशनी
आए-गए हुए परदेशी, यहाँ अभी भी वही चाँदनी 

अपना बना हजम कर लेती, चाल यहाँ की ढीली-ढीली
मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतुरंग-रंगीली

मन में राम, बाल में गीता, घर-घर आदर रामायण का
किसी वंश का कोई मानव, अंश साझते नारायण का

ऐसे हैं बहरत के वासी, गात गठीला, बाट चुटीली
मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतुरंग-रंगीली

आन कठिन भारत की लेकिन, नर-नारी का सरल देश है
देश और भी हैं दुनिया में, पर गाँधी का यही देश है

जहाँ राम की जय जग बोला, बजी श्याम की वेणु सुरीली 
मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतु-रंग-रंगीली

लो गंगा-यमुना-सरस्वती या लो मंदिर-मस्जिद-गिरजा
ब्रह्मा-विष्णु-महेश भजो या जीवन-मरण-मोक्ष की चर्चा

सबका यहीं त्रिवेणी-संगम, ज्ञान गहनतम, कला रसीली 
मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतु-रंग-रंगीली

कवि — गोपाल सिंह नेपाली

भारत की आरती

भारत की आरती
देश-देश की स्वतंत्रता देवी
आज अमित प्रेम से उतारती।

निकटपूर्व, पूर्व, पूर्व-दक्षिण में
जन-गण-मन इस अपूर्व शुभ क्षण में
गाते हों घर में हों या रण में
भारत की लोकतंत्र भारती।

गर्व आज करता है एशिया
अरब, चीन, मिस्र, हिंद-एशिया
उत्तर की लोक संघ शक्तियां
युग-युग की आशाएं वारतीं।

साम्राज्य पूंजी का क्षत होवे
ऊंच-नीच का विधान नत होवे
साधिकार जनता उन्नत होवे
जो समाजवाद जय पुकारती।

जन का विश्वास ही हिमालय है
भारत का जन-मन ही गंगा है
हिन्द महासागर लोकाशय है
यही शक्ति सत्य को उभारती।

यह किसान कमकर की भूमि है
पावन बलिदानों की भूमि है
भव के अरमानों की भूमि है
मानव इतिहास को संवारती।

कवि -शमशेर बहादुर सिंह

जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा

जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा
जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा
ये धरती वो जहाँ ऋषि मुनि जपते प्रभु नाम की माला
जहाँ हर बालक एक मोहन है और राधा हर एक बाला
जहाँ सूरज सबसे पहले आ कर डाले अपना फेरा
वो भारत देश है मेरा
अलबेलों की इस धरती के त्योहार भी हैं अलबेले
कहीं दीवाली की जगमग है कहीं हैं होली के मेले
जहाँ राग रंग और हँसी खुशी का चारों ओर है घेरा
वो भारत देश है मेरा
जब आसमान से बातें करते मंदिर और शिवाले
जहाँ किसी नगर में किसी द्वार पर कोई न ताला डाले
प्रेम की बंसी जहाँ बजाता है ये शाम सवेरा
वो भारत देश है मेरा

कवि—राजेंद्र किशन

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है

ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है

खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

कवि — बिस्मिल अज़ीमाबादी
key desh bhakti kavita

जन गण मन

जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता

पंजाब, सिन्ध, गुजरात, मराठा द्राविड़, उत्कल, बंग

विन्ध्य, हिमाचल, यमुना, गंगा उच्छल जलधि तरंग

तव शुभ नामे जागे तव शुभ आशिष मागे

गाहे तव जय गाथा जन गण मंगल दायक जय हे

भारत भाग्य विधाता जय हे, जय हे, जय हे

जय जय जय जय हे अहरह तव आह्वान प्रचारित,

शुनि तव उदार वाणी हिन्दु बौद्ध शिख जैन पारसिक

मुसलमान क्रिस्टानी पूरब पश्चिम आसे

तव सिंहासन-पाशे प्रेमहार हय गाथा।

जनगण-ऐक्य-विधायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे जय जय जय जय हे

पतन-अभ्युदय-वन्धुर-पंथा, युगयुग धावित यात्री,

हे चिर-सारथी, तव रथ चक्रेमुखरित पथ दिन-रात्रि

दारुण विप्लव-माझे तव शंखध्वनि बाजे,

संकट-दुख-श्राता, जन-गण-पथ-परिचायक जय हे

भारत-भाग्य-विधाता, जय हे, जय हे, जय हे,

जय जय जय जय हे घोर-तिमिर-घन-निविङ-निशीथ

पीङित मुर्च्छित-देशे जाग्रत दिल तव अविचल मंगल

नत नत-नयने अनिमेष दुस्वप्ने आतंके

रक्षा करिजे अंके स्नेहमयी तुमि माता,

जन-गण-दुखत्रायक जय हे भारत-भाग्य-विधाता,

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे

रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि पूरब-उदय-गिरि-भाले,

साहे विहन्गम, पून्नो समीरण नव-जीवन-रस ढाले,

तव करुणारुण-रागे निद्रित भारत जागे

तव चरणे नत माथा, जय जय जय हे, जय राजेश्वर,

भारत-भाग्य-विधाता, जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे

— रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आज तिरंगा फहराता है

Desh Bhakti Kavita In Hindi
आज तिरंगा फहराता है अपनी पूरी शान से।
हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।
आज़ादी के लिए हमारी लंबी चली लड़ाई थी।
लाखों लोगों ने प्राणों से कीमत बड़ी चुकाई थी।।
व्यापारी बनकर आए और छल से हम पर राज किया।
हमको आपस में लड़वाने की नीति अपनाई थी।।

हमने अपना गौरव पाया, अपने स्वाभिमान से।
हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

गांधी, तिलक, सुभाष, जवाहर का प्यारा यह देश है।
जियो और जीने दो का सबको देता संदेश है।।
प्रहरी बनकर खड़ा हिमालय जिसके उत्तर द्वार पर।
हिंद महासागर दक्षिण में इसके लिए विशेष है।।

लगी गूँजने दसों दिशाएँ वीरों के यशगान से।
हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

हमें हमारी मातृभूमि से इतना मिला दुलार है।
उसके आँचल की छैयाँ से छोटा ये संसार है।।
हम न कभी हिंसा के आगे अपना शीश झुकाएँगे।
सच पूछो तो पूरा विश्व हमारा ही परिवार है।।

कवि — सजीवन मयंक

उठो, धरा के अमर सपूतों।

उठो, धरा के अमर सपूतों।
पुन: नया निर्माण करो।
जन-जन के जीवन में फिर से
नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो।
नई प्रात है नई बात है
नया किरन है, ज्योति नई।
नई उमंगें, नई तरंगें
नई आस है, साँस नई।
युग-युग के मुरझे सुमनों में
नई-नई मुस्कान भरो।
उठो, धरा के अमर सपूतों।
पुन: नया निर्माण करो।।1।।
डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ
नए स्वरों में गाते हैं।
गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें
मस्त उधर मँडराते हैं।
नवयुग की नूतन वीणा में
नया राग, नव गान भरो।
उठो, धरा के अमर सपूतों।
पुन: नया निर्माण करो।।2।।
कली-कली खिल रही इधर
वह फूल-फूल मुस्काया है।
धरती माँ की आज हो रही
नई सुनहरी काया है।
नूतन मंगलमय ध्वनियों से
गुँजित जग-उद्यान करो।
उठो, धरा के अमर सपूतों।
पुन: नया निर्माण करो।।3।।
सरस्वती का पावन मंदिर
शुभ संपत्ति तुम्हारी है।
तुममें से हर बालक इसका
रक्षक और पुजारी है।
शत-शत दीपक जला ज्ञान के
नवयुग का आह्वान करो।
उठो, धरा के अमर सपूतों।
पुन: नया निर्माण करो।।4।।

कवि—द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हरी भरी धरती हो

boys with indonesian flag in the field near the waterfall

हरी भरी धरती हो
नीला आसमान रहे
फहराता तिरँगा,
चाँद तारों के समान रहे।
त्याग शूर वीरता
महानता का मंत्र है
मेरा यह देश
एक अभिनव गणतंत्र है

शांति अमन चैन रहे,
खुशहाली छाये
बच्चों को बूढों को
सबको हर्षाये

हम सबके चेहरो पर
फैली मुस्कान रहे
फहराता तिरँगा चाँद
तारों के समान रहे।

कवि —कमलेश कुमार दीवान

अमरपुरी से भी बढ़कर के जिसका गौरव-गान है

अमरपुरी से भी बढ़कर के जिसका गौरव-गान है
तीन लोक से न्यारा अपना प्यारा हिंदुस्तान है।
गंगा, यमुना सरस्वती से सिंचित जो गत-क्लेश है।
सजला, सफला, शस्य-श्यामला जिसकी धरा विशेष है।
ज्ञान-रश्मि जिसने बिखेर कर किया विश्व-कल्याण है-
सतत-सत्य-रत, धर्म-प्राण वह अपना भारत देश है।

यहीं मिला आकार ‘ज्ञेय’ को मिली नई सौग़ात है-
इसके ‘दर्शन’ का प्रकाश ही युग के लिए विहान है।
वेदों के मंत्रों से गुंजित स्वर जिसका निर्भ्रांत है।
प्रज्ञा की गरिमा से दीपित जग-जीवन अक्लांत है।
अंधकार में डूबी संसृति को दी जिसने दृष्टि है-
तपोभूमि वह जहाँ कर्म की सरिता बहती शांत है।
इसकी संस्कृति शुभ्र, न आक्षेपों से धूमिल कभी हुई-
अति उदात्त आदर्शों की निधियों से यह धनवान है।।

योग-भोग के बीच बना संतुलन जहाँ निष्काम है।
जिस धरती की आध्यात्मिकता, का शुचि रूप ललाम है।
निस्पृह स्वर गीता-गायक के गूँज रहें अब भी जहाँ-
कोटि-कोटि उस जन्मभूमि को श्रद्धावनत प्रणाम है।
यहाँ नीति-निर्देशक तत्वों की सत्ता महनीय है-
ऋषि-मुनियों का देश अमर यह भारतवर्ष महान है।

क्षमा, दया, धृति के पोषण का इसी भूमि को श्रेय है।
सात्विकता की मूर्ति मनोरम इसकी गाथा गेय है।
बल-विक्रम का सिंधु कि जिसके चरणों पर है लोटता-
स्वर्गादपि गरीयसी जननी अपराजिता अजेय है।
समता, ममता और एकता का पावन उद्गम यह है
देवोपम जन-जन है इसका हर पत्थर भगवान है।

कवि —डॉ. गणेशदत्त सारस्वत

हमें मिली आज़ादी

आज तिरंगा फहराता है अपनी पूरी शान से।
हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।
आज़ादी के लिए हमारी लंबी चली लड़ाई थी।
लाखों लोगों ने प्राणों से कीमत बड़ी चुकाई थी।।
व्यापारी बनकर आए और छल से हम पर राज किया।
हमको आपस में लड़वाने की नीति अपनाई थी।।


हमने अपना गौरव पाया, अपने स्वाभिमान से।
हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

गांधी, तिलक, सुभाष, जवाहर का प्यारा यह देश है।
जियो और जीने दो का सबको देता संदेश है।।
प्रहरी बनकर खड़ा हिमालय जिसके उत्तर द्वार पर।
हिंद महासागर दक्षिण में इसके लिए विशेष है।।

लगी गूँजने दसों दिशाएँ वीरों के यशगान से।
हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

हमें हमारी मातृभूमि से इतना मिला दुलार है।
उसके आँचल की छैयाँ से छोटा ये संसार है।।
हम न कभी हिंसा के आगे अपना शीश झुकाएँगे।
सच पूछो तो पूरा विश्व हमारा ही परिवार है।।

विश्वशांति की चली हवाएँ अपने हिंदुस्तान से।
हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

कवि -सजीवन मयंक

बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से

बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से,
लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से।

लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी,
तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से।

खुली है मुझको लेने के लिए आग़ोशे आज़ादी,
ख़ुशी है, हो गया महबूब का दीदार फांसी से।

कभी ओ बेख़बर तहरीके़-आज़ादी भी रुकती है?
बढ़ा करती है उसकी तेज़ी-ए-रफ़्तार फांसी से।

यहां तक सरफ़रोशाने-वतन बढ़ जाएंगे क़ातिल,
कि लटकाने पड़ेंगे नित मुझे दो-चार फांसी से।

कवि -राम प्रसाद बिस्मिल

शहीद की माँ 

इसी घर से
एक दिन
शहीद का जनाज़ा निकला था,
तिरंगे में लिपटा,
हज़ारों की भीड़ में।
काँधा देने की होड़ में
सैकड़ो के कुर्ते फटे थे,
पुट्ठे छिले थे।
भारत माता की जय,
इंकलाब ज़िन्दाबाद,
अंग्रेजी सरकार मुर्दाबाद
के नारों में शहीद की माँ का रोदन
डूब गया था।
उसके आँसुओ की लड़ी
फूल, खील, बताशों की झडी में
छिप गई थी,
जनता चिल्लाई थी-
तेरा नाम सोने के अक्षरों में लिखा जाएगा।
गली किसी गर्व से
दिप गई थी।


इसी घर से
तीस बरस बाद
शहीद की माँ का जनाजा निकला है,
तिरंगे में लिपटा नहीं,
(क्योंकि वह ख़ास-ख़ास
लोगों के लिये विहित है)
केवल चार काँधों पर
राम नाम सत्य है
गोपाल नाम सत्य है
के पुराने नारों पर;
चर्चा है, बुढिया बे-सहारा थी,
जीवन के कष्टों से मुक्त हुई,
गली किसी राहत से
छुई छुई।

कवि -हरिवंशराय बच्चन

पुष्प की अभिलाषा 

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ,

चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ,

मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पर जावें वीर अनेक.

कवि -माखनलाल चतुर्वेदी

सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ता हमारा

key desh bhakti kavita

हम बुलबुले है इसकी यह गुल्सिंता हमारा
गुरबत में हो अगर हम रहता है दिल वतन में
समझो वही हमे भी, दिल हो जहाँ हमारा
पर्वत वो सबसे ऊँचा हमसाया आसमा का
वो संतरी हमारा, वो पासवां हमारा


गोदी में खेलती है इसके हजारों नदियाँ
गुलशन है जिसके दम से रश्के जीना हमारा
अय आबे रुदे गंगा वो दिन है याद तुझ्कों
उतरा तेरे किनारे जब कारवा हमारा
मजहब नही सिखाता आपस में बैर रखना
हिंदी है हम वतन है हिन्दोस्तान हमारा
यूनानों मिस्त्रो रुमान सब मिट गये जहाँ से
अब तक मगर है बाकी नामों निशां हमारा.
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नही हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमा हमारा
”इकबाल” कोई मरहम नही अपना जहाँ में
मालूम क्या किसी को दर्दे निहां हमारा

आज़ादी अभी अधूरी है।

पन्द्रह अगस्त का दिन कहता – आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाक़ी हैं, राखी की शपथ न पूरी है॥

जिनकी लाशों पर पग धर कर आजादी भारत में आई।
वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥

कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥

हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥

इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है।
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,डालर मन में मुस्काता है॥

भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाए जाते हैं।
सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं॥

लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया।
पख़्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन ग़ुलामी का साया॥


बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥

कवि-अटल बिहारी वाजपेयी 

हम करे राष्ट्र आराधना 

हम करे राष्ट्र आराधना,
तन से, मन से, धन से,
तन, मन, धन, जीवन से,
हम करे राष्ट्र आराधना |

अन्तर से, मुह्ख से, करती से,
निष्चल हो निर्मळ मती से,
श्रधा से, मसतक नती से,
हम करे राष्ट्र अभिवादन ||


अपनें हसते सेशव से,
अपने खीलते यौवन से,
प्रोढ़ता पुर्ण जीवन से,
हम करे राष्टर का अरचन ||


अपने अतीत को पढ़कर,
अपने ईतिहास को उल्टकर ,
अपना भविष्य समझकर,
हम करे राष्टर का चिन्तन ||

याद हमे हैं युग-युग की,
जलती अनेकों घटनाए,
जो मा की सेवा पाथ पर,
आई बनकर विपदाए |


हमने अभिशेक किया था,
जननी का अरी-शोनीत से,
हमने श्रंगार किया था,
माता अरी मुंडो से ||

महाराणा प्रताप

वह मातृभूमि का रखवाला
आन-बान पर मिटने वाला,
स्वतंत्रता की वेदी पर
जिसने सब कुछ था दे डाला |

स्वाभिमान का अटल हिमाला
कष्टों से कब डिगने वाला,
जो सोच लिया कर दिखलाया
ऐसा प्रताप हिम्मतवाला |

थे कई प्रलोभन झुका नही,
आंधी तूफा में रुका नही,
आजादी का ऐसा सूरज
उजियारा जिसका चूका नही |

वह नीले घोड़े का सवार
.वह हल्दीघाटी का जुझार,
वह इतिहासों का अमरपृष्ट
मेवाड़ शोर्य का वह अंगार |


धरती जागी, आकाश जगा
वह जागा तो मेवाड़ जगा,
वह गरजा, गरजी दसों दिशा
था पवन रह गया ठगा-ठगा |

हर मन पर था उसका शासन
पत्थर-पत्थर था सिहासन,
महलों से नाता तोड़ लिया
थी सारी वसुधा राजभवन |

वह जनजन का उन् नायक था
वो सब का भाग्य विधायक था,
सेना नही थी उसके पास
फिर भी वो सेनानायक था |

जगल जगल में वह घुमा
काटो को बढ़-बढ़ कर चूमा
जितनी विपदाए प्रखर हुई
उतना ही वह ज्यादा झुमा

सब विपक्ष में था उसके
बस, सत्य पक्ष में था उसके,
समझौता उसने नही किया
जाने क्या मन में था उसके |

वह सत्यपथी, वह स्त्यक्रती,
.वह तेजपुंज, वह म्हाध्रति,
वह शौर्यपुंज, भू की धाती
वह महामानव, वह महाव्रती |

एक सैनिक की चिट्टी आई

a man in black uniform walking on the street

एक सैनिक की चिट्टी आई,
एक परिवार की चिट्टी लाई !
माँ ने दौड़ के ले ली चिट्टी,
जब की नहीं थी पढ़ीलिखी !
तेरा कुशलता जान में लेती,
मन दिल को समझता है !
पढ़ने को जब चिट्टी खोली,
गम का कोई तूफान चला !
ऐसी खबर लिखी थी उसमे,
उसको पड़ता कौन भला !
सब के चेहरे अधुरा थे,
जैसे दिल हो कोई जला !

कवि–Ritika Sharma

हम भारत के भरत

हम भारत के भरत खेलते, शेरों की सन्तान से,
कोई देश नही दुनिया में बढ़कर हिंदुस्तान से,
इस मिट्टी में पैदा होना, बड़े गर्व की बात हैं,
साहस और वीरता अपने पुरखों की सौगात हैं ||

बड़ी बड़ी ज्वालाओं से कम, नही यहाँ चिनगारियाँ
कांटे पहले, फूल बाद में, देती हैं फुलवारियां
कभी दहकते कभी महकते जीते मरते शान से
कोई देश नही दुनिया में बढ़कर हिंदुस्तान से ||


कूद समर में आगे आए, जब भी हमकों ललकारने
ऊँगली दांतों तले दबाई, अचरज से संसार ने
सदियों से बनते आए हैं, हम पन्ने इतिहास के
त्याग और बलिदान हमारे व्रत हैं बारह मास के
जब भी निकला हीरा निकला, यहाँ किसी भी खान से
कोई देश नही दुनिया में बढ़कर हिंदुस्तान से ||

यह धरती माँ हैं अपनी, हमे जान से प्यारी हैं
हर बालक के जिम्मे इसकी चौकस पहरेदारी हैं
बोलो मेहनत खूब करेगे, कठिन परीक्षा आई हैं,
माँ का दूध पिया जो हैं, सौगंध उसी की खाई हैं
इसी उम्रः में परिचय पा ले, हम श्रम से बलिदान से,
कोई देश नही दुनिया में बढ़कर हिंदुस्तान से ||

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